श्रीराम जी को क्यों कहा जाता है मर्यादा पुरशोत्तम?(कैसा था भगवान श्रीराम का चरित्र?क्यों हर मनुष्य चाहता है भगवान राम जैसा बनना?)Why is Shri Ram called Maryada Purshottam? (What was the character of Lord Shri Ram? Why does every human being want to become like Lord Ram?)

आज के इस पोस्ट में हम आपको एक महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर देंगे की,आख़िर क्यों कहा जाता है प्रभु श्रीराम को मर्यादा पुरशोत्तम।भगवान तो हर जगह पाए जाते हैं।इसलिए कहा गया है कि,“तुझमें राम मुझमें राम सबमे राम समाया है,करलो सबसे प्यार जगत में कोई नहीं पराया है”।वो हर रूप में हमारे आसपास रहते हैं।ईश्वर तो हर कण-कण में बसा हुआ है।आपको बताना चाहेंगे की रामचरितमानस के प्रारम्भ में शिव पार्वती संवाद है।यानी की भगवान शंकर जी ने पार्वती माता को जब स्वीकार किया था पत्नी के रूप में।भगवान शंकर ने माता पार्वती को यह भी बताया था कि मैं प्रभु राम का परम भक्त हूँ।मैं उनकी पूजा एवं अर्चना करता हूँ।मेरा प्रभु श्रीराम जी के चरणों में प्रेम अटल है।

मनुष्य का सबसे सुंदर सपना क्या है?

Table of Contents

मनुष्यता ने जितने सपने देखें हैं उनमें राम सबसे सुंदर सपना है,सबसे प्यारा सपना है।बहुत ही विनम्र स्वभाव के थे मेरे प्रभु श्रीराम।आप जिस दिन से अपने आप को रामजी की आदतों से जोड लेंगे उसदिन आप सारी चिंताओं से मुक्त हो जाएँगे।हम हर सामने वाले व्यक्ति में भगवान को देखना चाहिए क्योंकि,भगवान हर किसीमे मौजूद होते हैं।और,जिस दिन से हम ऐसा करने लगेंगे उस दिन से ही हमारे सारे दुःख अपने आप ख़त्म हो जाएँगे।इसलिए रामजी को मनुष्यता की आँख का सबसे बड़ा सपना कहा गया है।हम सबको थोड़ा बहुत ज्ञान तो होता ही है लेकिन हमें अपने शास्त्र का भी ज्ञान होना बहुत ज़रूरी है।हर कोई आज कल विदेशी कल्चर अपनाना चाहता है लेकिन कोई अपने धर्म की बातों को नहीं मानना चाहता।हर कोई अपने अपने धर्म को मानता है लेकिन,धर्म की नहीं मानता।

रामजी बहुत ही विनम्र स्वभाव के थे।

राम एक सामाजिक व्यक्ति थे।प्रभु श्रीराम का स्वभाव बहुत ही विनम्र है।रामजी का वंश इक्ष्वाक वंश कहलाता है।इख को इक्षु कहते हैं।इख अकेली ऐसी फ़सल है जिसका सब कुछ काम आता है।इख प्रतीक है इक्ष्वाक वंश का जिसका ना रस समाप्त होता है और नाहीं यश समाप्त होता है।रामजी थोड़े-थोड़े अपने पूर्वजों की तरह भी थे आइए हम आपको नीचे बताते हैं उनके बारे में।

राजा दिलीप: रामजी के एक पूर्वज थे दिलीप,जिन्होंने गाय को बचाने के लिए अपना जीवन उत्सर्ग कर दिया। सच्चे वाले गौ-पालक थे वो।रामजी भी उनकी तरह गौ प्रेमी हैं।इसलिए तुलसीदास जी ने कहा है की,विप्र,धेनु संत,सभी को बचाने के हित में प्रभु श्रीराम जी ने जन्म लिया है।

राजा हरीशचंद्र: दूसरा वो अपने सबसे पुराने पूर्वज हरीशचंद्र,जिन्होंने मणिकर्णिका घाट पर अपनी पत्नी से टैक्स माँग लिया था,और जब उन्होंने साड़ी को फाड़ा तो वहीं से सतयुग के समापन की घोषणा हुई।रामजी के पूर्वज थे वे,उनकी तरह हैं रामजी।

राजा दशरथ: अपने पिता दशरथ जी की तरह बात पर अड़ जाने वाले हैं वो,यानी की जब कुछ ठान लिया तो अब वही करना है।

राजा भगीरथ: भगवान रामजी के एक और पूर्वज है भगीरथ,जिन्होंने हज़ारों वर्षों तक तपस्या की।भगीरथि नदी के शिला पर बैठ के उन्होंने हज़ारों वर्ष तप किया था।तब जाकर गंगा जी प्रकट हुई और पृथ्वी पर आयी।गंगा नदी इसलिए मोक्षदायिनी कहलाती हैं।उन्मे भगीरथ जैसी इच्छा थी।

रामजी का पूरा चरित्र प्रकाश नहीं दृष्टि है

रामजी के बारे में यही कहा जाता है की वे अवतार हैं।अवतार क्या होता है?अवतार मनुष्य की बनायी हुई इस पृथ्वी पर जो थोड़ी बहुत मनुष्य ने चीज़ें बनायी हैं,इसमें ईश्वर के भरोसे का नाम अवतार है।भले ही राजा राम का राज्याभिषेक नहीं हुआ था लेकिन,प्रजा से जब भी पूछा जाता था की यहाँ किसकी सरकार है तो सब यहीं जवाब देते थे की यह राजा राम की सरकार है।रामजी का पूरा चरित्र प्रकाश नहीं दृष्टि है।राम की विजय उनकी निजिता का उत्सव नहीं है।रामजी की जीत उनकी अपनी जीत नहीं थी।इसलिए,आज रामजी चले गए वो नहीं है यहाँ पर लेकिन उत्सव जारी है।रामजी ने हज़ारों साल पहले अंधकार के ख़िलाफ़ सबसे बड़ी जीत हासिल की थी।

महात्मा गांधीजी बिलकुल रामजी की तरह थे।

अयोध्या जाते समय और अयोध्या से लौटते समय रामजी ने जो सबसे महान काम किया वो एकात्मकता का काम किया।अयोध्या से लौटते समय उन्होंने वो हर काम किया जो इस देश को एक साथ जोड़ सकता है,जो इस देश को एकसाथ बाँध सकता है।महात्मा गांधी जी के पूरे संघर्ष पर रामजी की छाप है।उन्हें पता था की साउथ अफ़्रीका में वो जिनके ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं, सूट,बूट पहन के उनके ख़िलाफ़ नहीं लड़ सकते।इसलिए सबसे पहला काम उन्होंने यह किया की,वो कपड़े उन्होंने त्याग दिया और रामजी की तरह सामान्य कपड़े पहन लिए। फिर भी अभी उन्हें लगा की,अभी भी वो वेशभूषा नहीं आयी है जैसा रामजी पहनते थे तो उन्होंने एक धोती ऊपर पहनी,एक नीचे पहनी और तीन सालों तक भारत का दौरा किया यानी की,भारत को घुमा उन्होंने।बिहार के दूर के हिस्से पर पहुँचने पर उन्होंने देखा की,एक महिला के पास एक ही कपड़ा था,वो नहा रही थी ताकि ट्रेन चली जाए तब वो पानी से निकले,बापू पानी पीने उतरे तो उन्होंने अपनी ऊपर वाली धोती उस महिला को दे दी।उन्होंने कस्तूरबा से कहा की अगर इस देश में ऐसे लोग हैं जिनके पास एक भी कपड़ा नहीं है,तो 2 कपड़े पहनना अपराध है।

राम जी का वन जाना बहुत ज़रूरी था।

दशरथ पुत्र रामजी अगर अयोध्या में रहते तो केवल राम बनके रह जाते।जंगल-जंगल जाके लौटे तो वो मर्यादा पुरशोत्तम भगवान राम कहलाने लगे।रामजी जब वनवास जाने लगे तो उनके पिता जी ने कहा की सेना साथ ले जाओ तो उन्होंने माना कर दिया।फिर पिता जी ने बोला की अंगरक्षक साथ ले जाओ तो उन्होंने कहा की, अगर मई अपने अंग की रक्षा के लिए किसिको ले जाऊँगा तो जिसकी रक्षा मैं करने जा रहा हूँ उनके लिए कैसे कुछ कर पाउँगा।रामजी सदैव सबका हित सोचते थे।रामजी उत्पीड़ितों के प्रथम सेनापति थे।मित्र के साथ हो,भाई के साथ हो,अपनी पत्नी के साथ हो,आदर्श जीवन कैसे जीना चाहिए वो रामजी ने ही बताया है।

राम जी की अपने जीवन में बस एक ही चाह थी।

सबसे पहले अपने पिता एवं अपने भाइयों के साथ उनका व्यवहार तो अतिउत्तम था।वे छोटों को भी सम्मान देकर बात करते थे।जब रामजी से कहा गया कि आपका राज्याभिषेक होने वाला है तब भी उन्होंने ये सवाल उठाया की हम चार भाई एक साथ इस धरती पर आए,एक साथ हमने शिक्षा प्राप्त की तो फिर राज्याभिषेक सिर्फ़ मेरा ही क्यों? रामजी की केवल यही अकेली शर्त थी जीवन में की सिर्फ़ बड़े बेटे को राज्य सिंहासन नहीं हम चारों का राज्यभिषेक होना चाहिए।यानी की रामजी समाजवाद के लिए सबसे पहले सोचते थे।

राम जी ने जंगल में सबसे पहले माता कैकेयी को प्रणाम क्यों किया।

रामजी कहते थे की अगर मेरे रहते मेरा मित्र दुखी है, तो मेरा रहके क्या फ़ायदा।रामजी अपने भक्तों को इसलिए प्रिय लगे हैं क्योंकि रामजी के जीवन में कोई चमत्कार नहीं है।राम कोई चमत्कार नहीं दिखाते उनकी शक्तियाँ अर्जित हैं।जब जंगल में सभी लोग भगवान रामजी से मिलने गए तो सबसे पहले उन्होंने,माता कैकेयी को प्रणाम किया,क्योंकि रामजी को पता था की माता कैकेयी बहुत दुखी हैं।अगर मई इनके पैर सबसे पहले छू लूँगा तो सबकी नज़रों में अच्छी बनी रहेंगी,इनके मन का दुःख कम होगा।राम जी की त्याग की सबसे बड़ी मूरत इसलिए कहलाते हैं।रामजी को वनवास हो ऐसा माता कैकेयी ही चाहती थी लेकिन रामजी ने कभी भी अपने मुख से माता कैकेयी के लिए गलत शब्द नहीं बोले।प्रभु श्रीराम जी के मन में तो माता कैकेयी के लिए और भी सम्मान आ गया।

वनवास स्वीकार करते ही राम जी मर्यादा पुरूषोत्तम बन गये

राम क्षत्रिय थे लेकिन मस्तिष्क उनका तपस्वियों जैसा था।राम एक युवराज थे लेकिन उनकी आत्मा एक संत की तरह था।रामजी के पूर्वज में जितने भी लोग थे सब महान थे।रामजी को जब पिताजी ने कहा की,राम कल वनवास नहीं हो पाएगा कल तुम अपनी पत्नी को लेकर वनवास पर चले जाओ।रामजी ने एक प्रश्न भी नहीं पूछा अपने पिताजी से और मुस्कुराते हुए बस इतना ही उत्तर दिया की,जो आज्ञा पिता जी।राम ने अत्यंत शालीनता और मुस्कान के साथ अपना वनवास स्वीकार किया।भगवान राम अपने कक्ष में गए और उन्होंने माता सीता से कहा की सीते कल हमें वनवास जाना है 14 वर्षों के लिए।रामजी को माता कौशल्या अपने पास बुलवाती हैं।वो भले ही भगवान की माँ थी लेकिन माँ तो माँ होती है।उन्हें यही चिंता थी की मेरा राम ठीक तो है ना? माँ ने रामजी से पूछा बेटा क्या हुआ पिताजी ने क्या कहा? रामजी ने मुस्कुराते हुए कहा माँ पिताजी ने मुझे जंगल का राज्य दे दिया पिता जी ने जहाँ मेरे सारे बड़े काम प्रतीक्षा कर रहे हैं।मैं जंगल का राजा बन गया।भगवान श्रीराम ने माता से कोई शिकायत नहीं की क्योंकि उनके मन में कोई शिकायत कोई बैर था ही नहीं।प्रभु श्रीराम तो बड़े ही निस्छल स्वभाव के थे।

राम जी वन गए तो बन गए।

रामजी बड़े ही विनम्र स्वभाव के थे।शालीन रहते थे वो।रामजी के चेहरे पर हमेशा एक मुस्कुराहट रहती थी।और इसी आत्मविश्वास में उनकी जीत है।रामजी ने अपने सहयोगियों का आत्मविश्वास बढ़ाया था हमेशा।संवाद न कर पाना आज के युवाओं की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है।रामजी ने अपने पूरे जीवन में किसी भी रक्षस को मारते हुए छोटों से बात चित नहीं की,सीधा आक्रमण किया।राम जी ने एक ही इंसान से बात-चित की जो था रावण।क्योंकि रामजी जानते थे कि रावण दुर्गुनों का भंडार है।रावण से बात करके कोई भी निष्कर्ष नहीं निकलेगा।इसलिए रामजी ने रावण का वध कर दिया।

नवरात्रि क्यों मनायी जाती है?

राम और रावण के युद्ध में एक दिन ऐसा आया था जिस दिन रामजी की सेना पराजित हो गयी थी।उसदिन सभी बेहोश हो गए थे।रामजी भी दुखी हो गए थे।जामवन्त जी ने रामजी से कहा की प्रभु आप क्यों दुखी होते हैं।आपके हाथो इस पापी का अंत तो निश्चित है।प्रभु रामजी ने कहा की, मैंने युद्ध के समय एक बात पर गौर किया कि रावण नहीं लड़ रहा था रावण के साथ उसकी शक्तियाँ लड़ रही थी।जामवंत जी ने कहा की अगर ऐसा है प्रभु तो हम युद्ध सम्भाल लेंगे आप पूजन शुरू कीजिए।फिर 108 कमल मँगाए गए।9 दिनो तक रामजी ने ध्यान धारण किया और 108 कमल को चढाते थे,माता शक्ति के चरणो में।आख़री दिन जिस दिन आया जिस दिन रामजी को वर मिलना था शक्ति का,107 कमल जब उन्होंने चढ़ा दिए,तब माता ने रामजी की परीक्षा लेने की सोची।आख़री कमल देवी माँ उठा ले गयी।रामजी ने जब कमल चढाने के लिए थाली में हाथ रखा तो कमल नहीं था थाली में।तब रामजी ध्यान से बाहर आए और उन्हें लगा की अब उनकी साधना भंग हो जाएगी।रामजी के आँखो में अश्रु आ गए।रामजी थोड़े दुखी हो गए।लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।रामजी को तब माँ की बात याद आ गयी की माँ मुझे कहती थी की तेरे राजीव नैन हैं यानी की, कमल जैसे 2 नैन हैं।तो मैं अपनी दोनो आँखें निकल कर देवी माँ को चढ़ा देता हूँ।जब उन्होंने तीर निकाला और अपनी आँख की ओर ले गए तो देवी माँ को लगा की अब ये अपनी आँखों को निकल लेंगे तब स्वयं माँ दुर्गा प्रकट हुई।माता दुर्गा ने रामजी का हाथ पकड़ लिया और कहा की,हे मर्यादा पुरशोत्तम राम आपकी ही जय हो।इस युद्ध में आपकी ही विजय होगी।इसलिए दशहरा के पहले 9 दिन माँ दुर्गा की पूजा एवं उपासना की जाती है क्योंकि भगवान रामजी ने भी रावण को मारने से पहले देवी माँ की 9 दिनो तक उपासना की थी।इसलिए कहा जाता है की, साधन महत्वपूर्ण नहीं हैं,साधन महत्वपूर्ण है।

रामजी से विभीषण ने युद्ध के दौरान क्या कहा?

रावण युद्ध के लिए आया तो रथ पर बैठ कर आया, और भगवान राम तो पैदल चल रहे हैं।विभीषण के मन में भी संदेह आ गया की, रावण तो रथ पर बैठ हुआ है और प्रभु के पैरों में तो चप्पल भी नहीं है तो कैसे युद्ध होगा अब? इतना बड़ा वीर है रावण इससे कैसे जीतोगे?राम जी ने उत्तर दिया की इस युद्ध में साधना की आवश्यकता है,साधन की नहीं।भगवान रामजी ने कहा की इस युद्ध में जीतने के लिए जिस रथ की ज़रूरत है वो मेरे पास है।विभीषण को रथ दिख ही नहीं रहा है,रामजी के पास रथ है।यह संवाद किसिको समझ नहीं रहा था।रामरथ की अपनी परिभाषा है।रामजी ने कहा मेरे पास जो रथ है उसमें 2 चक्के लगे हुए हैं।शौर्य और धैर्य नामक चक्के लगे हुए हैं।अगर बड़ी लड़ाई लड़नी है तो शौर्य भी रखना पड़ेगा और धैर्य भी रखना पड़ेगा।दुनिया की आधी मूर्खताएँ अधैर्यता के कारण होती है।बल और विवेक से दृढ़ हुई मेरी धर्म की ध्वजा है मेरे इस रथ के ऊपर।सत्य और शील ये घोड़े हैं मेरे।क्षमा, कृपा,सहानुभूति और दया इसकी इस रथ की डोर हैं।रामजी बोलते है की, इस रथ पर चढ़कर मैं लड़ रहा हूँ,और जब तक मैं इस रथ पर चढ़कर लड़ूँगा मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

रामजी ने युद्ध में जाने के समय किन लोगों को साथ लिया?

एक अयोध्या है जो सात्विकता का प्रतीक है और एक लंका है जो तामसिकता का प्रतीक है।इन दोनों के बीच लड़ाई है।राम इन दोनो की लड़ाई के लिए राजाओं को साथ नहीं लेते।रामजी वनवास के समय जहाँ गए थे जहाँ पर उन्होंने कुटिया बनायी थी उसके एकदम बग़ल में उनके मामा का घर यानी की राम का ननिहाल था,जिसका नाम था कौशलप्रदेश।वो अगर चाहते तो मामाजी से अपने भी मदत माँग सकते हैं की, थोड़ी सेना भिजवा दो युद्ध के लिए।राम ने अपनी लड़ाई के लिए शाही सेना के बजाय उत्पीड़ितों को चुना।रामजी ने पूरे रास्ता किसि राजा से बात नहीं की रामजी ने पूरे रास्ते वंचितो से,दलितों से ,पिछड़े लोगों से,छोटे जाती के लोगों से बात की।लंका को परास्त करने के लिए रामजी ने किष्किन्धा को साथ में लिया।किष्किंधा प्राकृतिक संसाधनों से भरी घाटी का प्रतीक है।किष्किन्धा,आयुर्वेद,योग,प्रकृति का सबसे बड़ा उदाहरण को साथ लिया।

रामजी तक पहुँचने की सीढ़ी हैं हनुमान जी।

हनुमान जी शांति का प्रतीक हैं।वो शांति की खोज में गए थे।शांति कौन है? माता सीता साक्षात शांति का प्रतीक है इस कथा में।शांति उस इंसान को मिलती है जो अपनी देह के लोभ से बाहर आ जाता है।जो विदेह हो जाता है।सीता जी के पिता जी का नाम विदेह था।वो राजा थे लेकिन,विदेह थे।जब राजा जनक लोकसभा में बैठे हुए थे तब उन्हें शांति नहीं मिली।जब सिंहासन पर बैठे थे तब नहीं मिली।सीता जी उन्हें तब मिली जब वे किसान की तरह पसीना बहा रहे थे खेत में।रामजी सूर्यवंशी हैं जो आकाश का ज्योतक है,और सीता जी माता पृथ्वी की पुत्री हैं।इसका मतलब यह है की यह प्रकृति के दोनों चीज़ों का मिश्रण है।रामजी के अलावा केवल हनुमानजी के ही मंदिर होने की महिमा है।हनुमान जी रामजी तक पहुँचने की सीढ़ी हैं।राम जैसा होने के लिए हनुमान जी का पूजन ज़रूर करें।

रामायण किसने लिखी?

हिंदुस्तान में जितने भी आक्रमण हुए इसमें कभी हम जीते कभी वो जीते।तर्कहीन श्रद्धा के कारण हारे हम।युद्ध में बराबर के हथियार इस्तमाल हो रहे थे।भारत के एक बेटे ने एक नया हथियार बनाया।और एक ऐसा हथियार बनाया की,फिर केवल संस्कृति जीती।भारत का वो बेटा रहता था चित्रकूट के पास।आत्माराम दुबे का लड़का जिसका नाम था तुलसी।उन्होंने 77 वर्ष की आयु में एक कहानी लिखी भगवान श्रीराम की।तुलसी की मानस आयी और फिर उसके बाद आम हिन्दुस्तानी में यह विश्वास आ गया की,अब हम भी लड़ सकते हैं बुराइयों के ख़िलाफ़।शक्ति अहंकार और विनम्रता दोनों पैदा कर सकती है।

राम और रावण में क्या अंतर है?

रावण को अहंकार था ना तो सत्य मानता था और नाहीं तथ्य मानता था।तथ्य यह है कि हार चुका है रावण।राम जी और रावण में एक पंक्ति का अंतर है।रावण अपनी इच्छा से तथ्यों से अनभिज्ञ है यानी की इच्छाओं में बँधा हुआ है,और राम इच्छाओं से परे जा चुके हैं।रावण को दण्ड देने की शक्ति है और राम को दण्ड देने का अधिकार है।रावण का अपयश बहुत है,जबकि वो खानदान में बड़े में पैदा हुआ है।रावण का अहंकार ही उसकी हीन भावना थी।राम जी का एक यश है सारे संसार में,वो इक्ष्वाक ख़ानदान में पैदा हुए थे।रावण और राम दोनों प्रतिष्ठित विरासतों से आते हैं।इसलिए कहा जाता है की,रावण की शक्ति भय देती है और रामजी की शक्ति की शक्ति निर्भय देती है।रावण अहंकार में अपमान करता था और रामजी अपने से छोटों को भी सम्मान देते थे।रावण परपीड़क है और राम सहानुभूतिशील।

हनुमान जी ने क्यों लगायी थी लंका में आग?

इस देश में सबसे ज़्यादा लोग इसी बात से दुखी है की उनका पड़ोसी सुखी है।अपने सुख से किसी को प्रसन्नता नहीं होती।रावण की भी यही समस्या थी।रावण भी दूसरों के दुःख से सुखी होता था।हनुमान जी जब लंका गये थे तब रावण उनकी पूँछ काट देता है।हनुमान जी ने भी सोचा की ठीक है काट लो मेरी पूँछ।सारा इंतज़ाम किया गया हनुमान जी की पूँछ जलाने का तेल लाया गया कपड़ा लाया गया और जैसी ही पूँछ में आग लगायी गयी वैसे ही हनुमान जी ने लंका में अपने पूँछ से आग लगा दी।केवल एक घर नहीं जलाया विभीषण का क्योंकि सबके घर से तेल आया था लेकिन विभीषण ने तेल नहीं दिया था।

रामजी ने अपने हाथों से क्यों किया था जटायु का अंतिम संस्कार?

रामजी ने जटायु के घाव को साफ़ किया था,अपने हाथों से।प्रभु श्रीराम जी ने अपने हाथो से जटायु का अंतिम संस्कार किया था।रामजी ने कहा की मैं दुर्भाग्यशाली हूँ की मुझे अपने पिता का अंतिम संस्कार करने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ,हे संत,हे जटायु,हे गिद्धराज आज आप मुझे अपना अंतिम संस्कार करने का अवसर देकर मेरे पुत्र होने को पूरा कर रहे हैं।शत्रुघ्न जी का ज़िक्र बहुत ही कम जगह पर किया जाता है।भरत की पत्नी मांडवि कहती है की,मेरा घर सम्भालने के लिए और कोई नहीं है।मेरे सबसे छोटे देवर शत्रुघ्न ने मेरा पूरा घर सम्भाला है।

निष्कर्ष

रामजी ने हर प्रकार से इस जीवन को बड़ा किया है,उन्होंने हर रिश्ता बहुत ही बख़ूबी से निभाया है।अगर हम रामजी की कुछ आदतों को भी अपने जीवन में लेकर आ जाए तो हमारे जीवन की आधी समस्याएँ अपने आप ख़त्म हो जाएँगी।रामजी ने हर फ़र्ज़ बहुत ही अच्छे से निभाया है।दुश्मन को खत्म करने के दो तरीके हैं- उसका सिर काट देना और दूसरा उससे दोस्ती कर लेना।जो वीर नहीं हो सकता वो महावीर नहीं हो सकता।इसी सब वजह से मेरे प्रभु रामजी कहलाते हैं मर्यादा पुरशोत्तम।

FAQ:

Q: लक्ष्मण जी की पत्नी का नाम क्या था?

Ans. लक्ष्मण जी की पत्नी का नाम उर्मिला था।

Q: राम जी के कितने भाई थे?

Ans. रामजी 4 भाई थे,राम,लक्ष्मण,भरत और शत्रुघ्न।

Q: रामजी की माता का नाम क्या था?

Ans. रामजी की माँ का नाम था माता कौशल्या।

Leave a Comment